दमोह । शायद ही साल का ऐसा कोई माह गुजरे जिस माह में किसी न किसी के घर का चिरांग न बुझा हो, साल 2025 में दमोह की धरती बार-बार खून से लाल हुई। जिले में डेढ़ दर्जन से ज्यादा हत्याएं, और दर्जन भर से अधिक हत्या के प्रयास—यह हालात की गंभीरता नहीं, बल्कि भयावहता का ऐलान है। पुरानी रंजिश, पारिवारिक कलह, जमीन-पैसे के विवाद और मामूली कहासुनी—हर वजह ने मिलकर जिले को हिंसा की प्रयोगशाला बना दिया।

आक्रोश, सनक और बेखौफ अपराध—एक पल का गुस्सा, उम्रभर का पछतावा
कई वारदातें रोकी जा सकती थीं, मगर गुस्से की आग और “देख लेने” की सनक ने हत्याओं को जन्म दिया। खमरिया गांव का मामला इसकी बानगी है—जहां छोटे भाई ने बड़े भाई को गोली मार दी। बाद में बयान आया—“इरादा नहीं था।” सवाल यह है कि जब ट्रिगर दबा, तब कानून का डर कहां था?

तीन साल का ट्रेंड—अपराध बढ़े, चिंता गहराई
2023: हत्या 19, हत्या का प्रयास 14
2024: हत्या 23, हत्या का प्रयास 16
2025 (दिसंबर तक): हत्या 18+ , हत्या का प्रयास 12+
ये आंकड़े चेतावनी नहीं, रेड अलर्ट हैं।
2025 की हत्याओं की काली फेहरिस्त
फरवरी: शराब विवाद में वृद्ध की धारदार हथियार से हत्या (जबलपुर नाका)
मार्च: मारुताल में बुजुर्ग पर हमला कर हत्या
अप्रैल: तारादेही जंगल में युवक का शव—हत्या की आशंका
अप्रैल: बांसनी में लूट के इरादे से महिला की हत्या
मई: धरम की टपरिया में जमीनी विवाद—पीट-पीटकर हत्या
जून: मड़ाहार पहाड़ी—बीमा के पैसों के लिए भाई ने भाई को मारा
जुलाई: कार से कुचलकर युवक की हत्या
अगस्त: बालाकोट—पुरानी रंजिश में गोली मारकर हत्या
सितंबर: शिकारपुरा—चुनावी रंजिश में गोली
सितंबर: खमरिया—फसल विवाद में भाई की हत्या
नवंबर: देहात थाना—खेत में कुल्हाड़ी से हत्या
नवंबर: घनेटा—100 रुपये न देने पर दादी की हत्या
नवंबर: शहर—17 वर्षीय सुमित जैन की चाकुओं से हत्या
दिसंबर में – बेलखेड़ी में हुई युवक की हत्या
हालिया: सेमरा मढ़िया—गला रेतकर युवक की हत्या
असुरक्षा की परछाईं, पुलिस पर बढ़ता दबाव
लगातार हत्याओं ने आमजन में भय और पुलिस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अपराधों की प्रकृति पहले से ज्यादा क्रूर और सुनियोजित दिख रही है। गिरफ्तारी और खुलासों के बावजूद वारदातें थम नहीं रहीं—यह कानून के प्रति घटते भय का सीधा संकेत है।
पुलिस का दावा—जनसंवाद से रोकथाम की कोशिश
एडिशनल एसपी सुजीत भदौरिया के मुताबिक, “अपराधों की रोकथाम के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जनसंवाद और जागरूकता से छोटे विवादों को गंभीर अपराध बनने से रोकने की पहल है, सभी मामलों की गहन जांच जारी है।”
बड़ा सवाल—क्या दमोह सुरक्षित होगा?
जिले की फिजा में बारूद घुल चुका है। अब सवाल सीधा है—क्या सख्त कार्रवाई, त्वरित न्याय और सामाजिक हस्तक्षेप से यह सिलसिला रुकेगा, या फिर हर महीने कोई नया मातम दस्तक देता रहेगा?









