दमोह। रनेह गांव की कुसुम आदिवासी के लिए गुरुवार की सुबह जीवनभर याद रहने वाली खुशखबरी लेकर आई। नौ बार घर पर प्रसव कर चुकी कुसुम ने इस बार अपना 10 वां शिशु रनेह सीएचसी में सुरक्षित नॉर्मल डिलीवरी के जरिए जन्म दिया। 3.5 किलोग्राम वजन का बेटा स्वस्थ है और कुसुम भी पूरी तरह स्वस्थ है। यह उपलब्धि केवल चिकित्सा सुविधा का परिणाम नहीं, बल्कि आशा कार्यकर्ता, आशा सुपरवाइजर, एएनएम और प्रशासन के सतत प्रयासों का फल है।
जोखिमों से भरा गर्भ, लेकिन हिम्मत नहीं हारी टीम ने
कुसुम का दसवां गर्भ कई जोखिम लेकर आया था—रक्त की कमी, लगातार घर पर प्रसव करने की आदत और ग्रामीण परंपराएं उसे अस्पताल आने से रोक रही थीं। लेकिन आशा सुपरवाइजर कुंती चौरसिया, आशा कार्यकर्ता राजबाई लोधी और एएनएम की महीनों की मेहनत रंग लाई। नौ महीने तक वे लगातार कुसुम के घर जाकर जांच करती रहीं, खतरों के बारे में समझाती रहीं और उसे संस्थागत प्रसव की महत्ता बताती रहीं।
इस अभियान में एसडीएम, थाना प्रभारी, जनप्रतिनिधि और पूरी रनेह स्वास्थ्य टीम ने भी सक्रिय सहयोग दिया। सामूहिक प्रयासों ने कुसुम और उसके परिवार का विश्वास जीता और समय पर अस्पताल पहुंचाने में कामयाबी मिली।
कुसुम बोली—”अस्पताल आने का लाभ अब समझ में आया”
कुसुम ने भावुक होकर कहा—“अगर आशा दीदी समझाने न आतीं, तो मैं फिर घर पर ही प्रसव कर लेती और खतरा बना रहता। लेकिन अब समझ में आया कि अस्पताल आने से ही मां और बच्चे दोनों सुरक्षित रहते हैं।”
कुसुम इससे पहले अपने सभी 9 बच्चों को घर पर ही जन्म दे चुकी है।
परिवार नियोजन पर बड़ा संदेश
कुसुम का दसवां प्रसव इस बात की ओर भी संकेत करता है कि ग्रामीण अंचलों में परिवार नियोजन कार्यक्रमों को और मजबूत करने की जरूरत है। कई परिवार आज भी कुरीतियों और जानकारी के अभाव के कारण जोखिम उठाते हैं। स्वास्थ्य विभाग अब कुसुम के परिवार को आगे की परामर्श सेवाएं दे रहा है।
अस्पतालों में प्रसव पूर्ण रूप से सुरक्षित — आशा सुपरवाइजर
आशा सुपरवाइजर कुंती चौरसिया ने बताया कि कुसुम शुरू में बिल्कुल तैयार नहीं थी, लेकिन लगातार समझाइश और विश्वास दिलाने के बाद वह तैयार हुई। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं से अपील की कि सरकारी अस्पतालों में प्रसव पूर्ण रूप से सुरक्षित होता है और सभी सेवाएं निःशुल्क उपलब्ध हैं। साथ ही शासन द्वारा पोषण के लिए अनुग्रह राशि भी दी जाती है।
यह सफलता सिर्फ एक प्रसव की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य जागरूकता में बढ़ते बदलाव का संकेत है, जहां सामूहिक प्रयासों से एक और परिवार सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ पाया।
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